Rulers of Marwar

Major & Important facts about Rulers of Marwar

मारवाड़ (जोधपुर क्षेत्र) उत्तर पश्चिमी भारत में दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान राज्य का एक क्षेत्र है। यह आंशिक रूप से थार रेगिस्तान में है। मारवाड़ी संस्कृत शब्द “मारुवत” से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ “रेगिस्तानी क्षेत्र” है।

जोधपुर राज्य 13 वीं शताब्दी में राजपूतों के राठौड़ कबीले द्वारा स्थापित किया गया था, जो कन्नौज के गहड़वाल राजाओं से वंश का दावा करते हैं। राठौड़ वंश के इतिहास के अनुसार कन्नौज के अंतिम गहड़वाल राजा जयचंद्र के पोते सियाजी गुजरात में द्वारका की तीर्थ यात्रा पर मारवाड़ आए थे। यहां उन्होंने पाली शहर में ब्राह्मण समुदाय की रक्षा के लिए आंशिक युद्ध लड़ा, जिसके उपरांत उनके दसवें उत्तराधिकारी राव (राजा) चंदा ने गुर्जर प्रतिहारों से मारवाड़ का नियंत्रण जीत लिया था। राव (राजा) चंदा ने मारवाड़ में राठौड़ वंश की स्थापना की थी।

जोधपुर के राठौड़ शासक

राव चंदा:

सियाजी के दसवें उत्तराधिकारी राव चंदा ने मारवाड़ की स्थापना की।

जिन्होंने मुल्तान के शासक सलीम शाह के साथ युद्ध में वीरगति प्राप्त की। जिसके उपरांत राव चंदा के पुत्र राव रणमल ने पुन्ह: सलीम शाह से अपना क्षेत्राधिकार (मंडौर का सिंहासन) प्राप्त किया।

राव जोधा (1438-1489)

राव जोधा राव रणमल के उत्तराधिकारी थे।
राव जोधा ने वर्ष 1459 में आधुनिक जोधपुर शहर की नींव रखी।
राणा कुंभा से पुणे मंडोर का किला जीता।
12 मई 1459 में श्री करणी जी महाराज के हाथों से मेहरानगढ़ किले की नींव रखवाई।
राव जोधा के पुत्र राव बीका ने वर्ष 1486 में बीकानेर की स्थापना की।

राव मालदेव (1532-1562)

राव मालदेव, राव गंगा के उत्तराधिकारी थे। जिन्होंने मुगल साम्राज्य के प्रारंभिक चरणों में हुमायूं के साथ सहयोग से इंकार कर दिया था।
मुस्लिम इतिहासकारों ने उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक” कहा था।
वर्ष 1543 के समेल के युद्ध में राव मालदेव शेर शाह सूरी से हार गए थे।
वर्ष 1562 में मेड़ता और अजमेर रियासत खोने के बाद राव मालदेव को अपने दो पुत्रों को बंधक के रूप में अकबर के सामने भेजना पड़ा।

राव चंद्र सेन (1562-1565)

राव चंद्र सेन, राव मालदेव के तृतीय पुत्र और उत्तराधिकारी थे।
जिन्होंने वर्ष 1562 की मेड़ता युद्ध के उपरांत अपना क्षेत्राधिकार खो दिया था।
यह युद्ध उन्होंने अपने बड़े भाई उदय सिंह (अकबर की तरफ से) के खिलाफ लड़ा था।
इस युद्ध के उपरांत वर्ष 1583 में मारवाड़ मुगल शासन का हिस्सा बना।

राव उदय सिंह (1583-1595)

राव मालदेव के पुत्र थे, जिन्होंने मेड़ता के युद्ध अकबर की और से लड़ा था।
राव उदय सिंह को मोटा राजा की पदवी से नवाजा गया था।

महाराजा गज सिंह प्रथम (1619-1638)

महाराजा गज सिंह प्रथम, सवाई राजा सूरजमल के उत्तराधिकारी थे।
उन्होंने “महाराजा” शीर्षक का उपयोग प्रारंभ किया था।

महाराजा जसवंत सिंह (1638-1678)

महाराजा जसवंत सिंह की नियुक्ति शाहजहां द्वारा की गई थी।
वह “सिद्धांत-बोध”, “आनंद विलास” और “भू-भूषण” के लेखक भी थे।
महाराजा जसवंत सिंह ने औरंगजेब के विद्रोह के समय शाहजहां का साथ दिया था।

महाराजा अजीतसिंह (1679-1724)

महाराजा अजीतसिंह, महाराजा जसवंत सिंह के उत्तराधिकारी थे।
औरंगजेब ने तत्कालीन परिस्थितियों में इंद्र सिंह को शासक के रूप में नियुक्त किया।
महाराजा अजीतसिंह के राजपूत मंत्री के पुत्र दुर्गादास ने अजीत सिंह को पुनः मंत्री बनाने का निवेदन औरंगजेब से किया था।
1707 ई0 औरंगजेब की मृत्यु के उपरांत पुनः दुर्गादास ने अजीत सिंह को जोधपुर का शासक बनवाया।

जानकारी का प्रमुख केंद्र: जोधपुर राज्य (Wikipedia)

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