यूगोंग-1: जैव जनरेटिव लाइफ-सपोर्ट बेस

12 मई 2017 को चीन ने 160 स्क्वायर मीटर आकार की “यूगोंग-1” नामक प्रयोगशाला की स्थापना की। यह प्रयोगशाला वैज्ञानिकों को चंद्रमा सम्मान वातावरण का अनुकरण करने के लिए बनाई गई है।

यूगोंग-1 प्रयोगशाला के महत्वपूर्ण तथ्य

बीजिंग के एस्ट्रोबिक्स अनुसंधान विश्वविद्यालय के चार स्नातकोत्तर छात्रों ने चंद्रमा पर इंसानों के लिए एक जैव जनरेटिव लाइफ-सपोर्ट बेस की स्थापना की।

यह प्रयोगशाला छात्रों को बाहर की दुनिया से अलग करने के लिए केबिन को अंदर से बंद करने का प्रावधान देती है ताकि दीर्घकालिक, आत्मनिहित अंतरिक्ष मिशन का अनुकरण किया जा सके।

यह केबिन बायो-किण्वन प्रक्रिया के माध्यम से मानव सिस्टम के उपचार की सुविधा प्रदान करती है। साथ ही भोजन और अपशिष्ट उत्पादों की मदद से प्रयोगात्मक फसलों को उगाने की भी सुविधा प्रदान करती है।

चीनी एजेंसियों के अनुसार यह कैबिन दुनिया का सबसे उन्नत जैव जनरेटिव लाइफ-सपोर्ट बेस का प्रतिनिधित्व करती है।

यूगोंग-1 विश्व का तीसरा जैव जनरेटिव लाइफ-सपोर्ट बेस है, जो पशु और सूक्ष्मजीवों के साथ-साथ पौधों और मनुष्यों को निवास करने की सुविधा प्रदान करता है।

यह कैबिन दो पौधे की खेती मॉड्यूल और चार बेड क्यूबिकल्स, एक कमरा, एक बाथरूम, एक अपशिष्ट उपचार कक्ष और जानवरों को बढ़ाने के लिए सुविधा कक्ष प्रदान करता है।

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भारतीय अंटार्कटिक अनुसंधान केंद्र

भारत अग्रिम 4 वर्षों में अंटार्कटिका पर अपने नए मैत्री अनुसंधान केंद्र को स्थापित करेगा. इस क्रम में 9 मई 2017 को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव माधवन नायर ने जानकारी प्रदान की. यह जानकारी कोलकाता स्थित टिटगढ़ वैगंस लिमिटेड द्वारा औपचारिक रूप से अंटार्कटिका पर शिप बिल्डिंग कार्यक्रम के दौरान की गई.

हमें ध्यान देना चाहिए कि भारत सबसे ठंडे महाद्वीप पर अपनी शोध गतिविधियों का विस्तार करने के लिए पूर्णतया एक नए जहाज, विशेष तौर पर बर्फ काटने में सक्षम की खरीद संबंधी कार्यवाही भी कर रहा है. इसके अतिरिक्त भारत अंटार्कटिका पर अपने हितों की रक्षा के लिए स्वयं के कानून का प्रारूप भी तैयार कर रहा है क्योंकि वर्तमान समय में अंटार्कटिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों द्वारा नियंत्रित है.

पृष्ठभूमि:

अंटार्कटिका और महासागर अनुसंधान केंद्र पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत एक बहु-अनुशासनिक, बहु-संस्थागत इकाई है.
भारत ने वर्ष 1981 में अंटार्कटिका के लिए अपने प्रथम भारतीय अनुसंधान कार्यक्रम का शुभारंभ किया था.
भारत ने अंटार्कटिका संधि पर हस्ताक्षर करके वर्ष 1983 में दक्षिण गंगोत्री आर्कटिक अनुसंधान कार्यक्रम के शिलान्यास संबंधित वैश्विक स्वीकृति प्राप्त की थी.
इसी क्रम में भारत में वर्ष 1990 में दक्षिण गंगोत्री आर्कटिक अनुसंधान कार्यक्रम का नाम बदलकर मैत्री अनुसंधान केंद्र किया था.
वर्ष 2015 में अंटार्कटिका पर भारत ने अपने नवीनतम अनुसंधान केंद्र भारती का शिलान्यास किया, जिसे 134 शिपिंग कंटेनरों द्वारा निर्मित किया गया.

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